दोस्तों जरा सोचिए एक मर्द जिसने अपने प्यार को पाने के लिए समाज से लड़ाई की। अपने बच्चों की आंखों में आंसू देखे और यहां तक कि अपना धर्म तक बदल डाला। उसने सोचा था कि यह जंग उसे हमेशा के लिए अपने प्यार की बाहों में पहुंचा देगी। लेकिन आज 90 साल की उम्र में जब जिंदगी के आखिरी मोड़ पर उसे सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत है। वही मोहब्बत उसके पास नहीं है। वो बिस्तर पर लेटा है। शरीर कमजोर सांसे भारी दरवाजे की तरफ उम्मीद से देखता है। लेकिन जो चेहरा आने चाहिए था वो नहीं आता और फिर चुपचाप बिना शोर बिना इल्जाम एक दूसरा चेहरा कमरे में दाखिल होता है।
वो चेहरा जिसे उसने बरसों पहले पीछे छोड़ दिया था। यह कोई फिल्म का सीन नहीं बल्कि एक सच्ची कहानी है। धर्मेंद्र की कहानी, वो इंसान जिसने ड्रीम गर्ल को पाने के लिए दुनिया से बगावत की लेकिन वक्त के खेल ने उसे उसी औरत की गोद में वापस ला खड़ा किया जिसे कभी उसने अतीत समझ कर छोड़ दिया था। कभी इस रिश्ते में शोहरत थी, गानों जैसी हंसी थी और वह जुनून था जिसे लोग अमर प्रेम कहते हैं। लेकिन अब बस खामोशी है। और उस खामोशी में अतीत का सबसे बड़ा ट्विस्ट। पहली पत्नी प्रकाश कौर की वापसी। यह कहानी सिर्फ प्यार और धोखे की नहीं बल्कि उस सच की है जिसे जिंदगी बुढ़ापे में दिखाती है कि असली साथी वही है जो मुश्किल वक्त में आपके पास खड़ा हो। तो आज हम बात करने जा रहे हैं धर्मेंद्र जी की जिंदगी में आए उस पड़ाव की जब उन्होंने बीमारी और तकलीफों के दौरान अपने सच्चे प्यार को पहचाना।
8 दिसंबर 1935 पंजाब के फगवाड़ा जिले के नसराली गांव में एक साधारण सा लड़का जन्म लेता है। धर्म सिंह देओल एक सरकारी स्कूल के हेड मास्टर का बेटा जिसकी जिंदगी खेतों की मिट्टी, स्कूल की घंटी और पंजाब की ठंडी हवाओं में बीत रही थी। पिता चाहते थे कि बेटा पढ़ाई में नाम कमाए लेकिन इस लड़के के दिल में किताबों से ज्यादा जगह सिनेमा के पर्दे ने ले रखी थी। गांव के मेले में लगने वाले प्रोजेक्टर शो या चौपाल पर चलने वाले फिल्मी गाने यह उसका असली स्कूल थे। लेकिन किस्मत हमेशा सपनों का इंतजार नहीं करती। घर की जिम्मेदारियां जल्दी कंधों पर आ गई। मुश्किलें ऐसी कि पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। साल 1954, उम्र सिर्फ 19 साल और परिवार ने बिना ज्यादा पूछे उसके लिए दुल्हन चुन दी। प्रकाश कौर यह शादी अरेंज थी। मोहब्बत से दूर लेकिन पंजाब की परंपराओं में डूबी हुई।
उस दौर में मर्द शादी के बाद भी अपने सपनों का पीछा कर सकता था। लेकिन औरत का सपना बस घर परिवार तक सिमट जाता था। प्रकाश बिल्कुल विपरीत स्वभाव की थी। ना फिल्मी दुनिया से लेना देना ना किसी तरह का दिखावा। वह गांव की रसोई में घंटों खाना बनाती। घर संभालती और किसी शिकायत के अपने पति की इच्छाओं का सम्मान करती। उन दिनों धर्मेंद्र खेतीबाड़ी में हाथ बटाते, लेकिन शाम को दोस्तों संग चौपाल पर बैठकर फिल्मों के किस्से सुनना उनका शौक था। फिल्मों का यह शौक अचानक एक मौके में बदल गया जब उन्होंने 1958 में फिल्मफेयर टैलेंट हंट में हिस्सा लिया। यह जानकारी बहुत लोग नहीं जानते कि उस समय यह प्रतियोगिता पूरे देश से केवल चुनिंदा लोगों को बुलाती थी और हजारों आवेदकों में से धर्मेंद्र का चयन उनके चेहरे की मासूमियत और गजब की बॉडी लैंग्वेज के कारण हुआ।
मुंबई का सफर शुरू हुआ। लेकिन प्रकाश अमृतसर में ससुराल में ही रहीं। उस वक्त एक शादीशुदा नौजवान का फिल्मों में जाना असामान्य था। इसलिए धर्मेंद्र ने निजी जीवन को पूरी तरह छुपाकर संघर्ष शुरू किया। छोटे-मोटे रोल, लंबे इंतजार और भूखे दिन यह सब उन्होंने अकेले झेले। लेकिन हर बार जब वह गांव लौटते तो प्रकाश कौर बिना कोई सवाल पूछे उनका स्वागत करती। मानो जानती हो कि यह सफर अभी लंबा चलना है। यही वो द्वार था जिसने धर्मेंद्र को एक साधारण पति से फिल्मों के सपनों के पीछे भागने वाला इंसान बना दिया। और धीरे-धीरे इस सफर में आने वाला तूफान उनकी जिंदगी बदलने वाला था। मुंबई वो शहर जहां सपने हकीकत बनते भी हैं और टूटते भी। धर्मेंद्र अपने छोटे से गांव से इस शहर में उतरे तो जेब में बस कुछ रुपए और दिल में ढेर सारा भरोसा था।
पर फिल्मी दुनिया का दरवाजा इतना आसान नहीं था। दिनभर स्टूडियो के बाहर चक्कर, रात को छोटे से कमरे में भूखे सोना, यही उनकी नई जिंदगी थी। शुरुआती दिनों में उन्होंने जूनियर आर्टिस्ट के रूप में भी काम किया और कभी-कभी फिल्मों के सेट पर सिर्फ देखने के लिए जाते कैमरे का जादू, लाइट्स की चमक और स्टार्स का रोब ये सब उनकी आंखों में बसता जा रहा था। लेकिन असली मौका 1960 में आया जब उन्हें दिल भी तेरा हम भी तेरे में पहला लीड रोल मिला। फिल्म, बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट नहीं थी। लेकिन धर्मेंद्र की सादगी और स्क्रीन प्रेजेंस ने डायरेक्टर्स का ध्यान खींच लिया। उनकी मेहनत और पर्सनालिटी की चमक ने उन्हें जल्दी ही अलग पहचान दिला दी। 60 के दशक में अनपढ़ हकीकत जैसी फिल्मों ने साबित किया कि वो सिर्फ हैंडसम हीरो नहीं बल्कि भावनाओं को स्क्रीन पर उतारने का हुनर भी रखते हैं। इस द्वार में उनका नाम उस समय के टॉप एक्शन हीरो और रोमांटिक स्टार्स में गिना जाने लगा। इसी बीच निजी जिंदगी में भी बड़ा बदलाव आया। 1960 के दशक के मध्य में उनके और प्रकाश कौर के घर दो बेटे हुए।
अजय सिंह देओल, सनी देओल और विजय सिंह देओल, बॉबी देओल दोनों के जन्म के समय धर्मेंद्र फिल्मों में अपने पांव जमा चुके थे। लेकिन काम का दबाव इतना था कि पिता का समय देना मुश्किल हो जाता। फिर भी गांव लौटने पर वो बच्चों के साथ मिट्टी में खेलते और मां प्रकाश कौर को महसूस कराते कि शोहरत के बीच भी उनका रिश्ता अभी कायम है। कम लोग जानते हैं कि इस समय तक धर्मेंद्र फिल्म इंडस्ट्री के वन टेक आर्टिस्ट कहे जाने लगे थे। उनके डायलॉग डिलीवरी और एक्शन सीक्वेंस इतने नेचुरल होते कि डायरेक्टर्स को रीटेक की जरूरत ही नहीं पड़ती और 1966 में फूल और पत्थर की जबरदस्त सफलता ने उन्हें स्टारडम के शिखर पर पहुंचा दिया। यह वही फिल्म थी जिसने उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड में बेस्ट एक्टर की नामांकन दिलाया और फिल्म इंडस्ट्री में उनका नाम पक्का कर दिया। लेकिन जैसे-जैसे स्टारडम चढ़ता गया उनके आसपास लोगों और खासकर खूबसूरत अदाकाराओं का दायरा भी बढ़ने लगा। साल 1970 धर्मेंद्र का करियर अपने सुनहरे दौर में था।
एक्शन हीरो के साथ-साथ रोमांटिक लवर बॉय की उनकी इमेज पर्दे पर भी चमक रही थी। इसी समय इंडस्ट्री में कदम रखी एक नई अभिनेत्री ने जिसने अपने पहले ही रोल से दर्शकों को दीवाना बना दिया। हेमा मालिनी। तमिलनाडु के एक ब्राह्मण परिवार की यह लड़की नृत्य और अभिनय में इतनी निपुण थी कि मीडिया ने उसे ड्रीम गर्ल का ताज दे दिया। धर्मेंद्र और हेमा की पहली मुलाकात फिल्म शराफत के सेट पर हुई। शुरू में यह रिश्ता बस प्रोफेशनल था। सीन खत्म होते दोनों अपने-अपने मेकअप रूम में चले जाते। लेकिन फिर आई तुम हसीन में जवान और खासकर सीता और गीता। इन फिल्मों की शूटिंग के दौरान दोनों के बीच एक अजीब सी सहजता आ गई। कैमरे के सामने उनका केमिस्ट्री इतना नेचुरल था कि डायरेक्टर्स तक को लगता यह सिर्फ एक्टिंग नहीं है। पर असली कहानी कैमरे के पीछे लिखी जा रही थी। धर्मेंद्र जो पहले से शादीशुदा थे और दो बच्चों के पिता हेमा के आकर्षण से बच नहीं पाए। वो सेठ पर उन्हें देख घंटों तक सीन रिहर्स करने का बहाना बनाते। यहां तक कि डायलॉग में गलती करके रिटेक मांगते।
बस थोड़ा और वक्त साथ बिताने के लिए वो सेठ पर गुलाबों के गुलदस्ते भेजते। शूटिंग खत्म होने के बाद भी कार में उनका इंतजार करते। धीरे-धीरे हेमा भी उनकी सच्चाई और मोहब्बत के आगे पिघलने लगी। यह रिश्ता किसी आम फिल्मी अफेयर जैसा नहीं था। धर्मेंद्र इसे पूरी तरह निभाना चाहते थे। लेकिन सबसे बड़ी दीवार थी। पहली पत्नी प्रकाश कौर। प्रकाश ने कभी तलाक देने से इंकार नहीं किया और इसने इस प्रेम कहानी को एक और नाटकीय मोड़ दे दिया। शोले की शूटिंग के दौरान धर्मेंद्र और हेमा मालिनी के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी थी। फिल्म के एक रोमांटिक सीन में धर्मेंद्र को हेमा का हाथ पकड़ना था। वह बार-बार कैमरा ऑपरेटर से कह देते कि फोकस गड़बड़ हो गया है या लाइट सही नहीं है ताकि सीन दोहराना पड़े और उन्हें हेमा के साथ थोड़ा और समय मिल सके। हेमा को भी समझ आ रहा था। लेकिन उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा। हेमा मालिनी को गाड़ी चलाना हमेशा से सीखना था। लेकिन फिल्मी काम के बीच उन्हें कभी सही मौका नहीं मिला। धर्मेंद्र को जब यह बात पता चली तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर कहा कि वे उन्हें ड्राइविंग सिखाएंगे।
शूटिंग के खाली समय में या पैकअप के बाद दोनों कार में निकलते और धर्मेंद्र धैर्य से उन्हें सिखाते। कभी गियर बदलने का तरीका बताते, कभी मोड़ पर सावधानी बरतने की सलाह देते। इन ड्राइविंग लेसंस के दौरान दोनों के बीच सिर्फ ड्राइविंग की बातें ही नहीं होती थी। बल्कि हंसीज़ाक और हल्की-फुल्की बातचीत भी होती थी। यही छोटे-छोटे पल धीरे-धीरे उनकी दोस्ती को गहरे रिश्ते में बदलने लगे। हेमा मालिनी की मां जया चक्रवर्ती अपनी बेटी के लिए हमेशा एक अविवाहित और स्थिर जीवन साथी चाहती थी। उन्हें धर्मेंद्र से रिश्ता मंजूर नहीं था क्योंकि वे पहले से शादीशुदा थे। कई बार उन्होंने हेमा को समझाने की कोशिश की कि यह रिश्ता आगे चलकर मुश्किलें ला सकता है। लेकिन धर्मेंद्र ने हार नहीं मानी। एक बार वे फूलों की बड़ी टोकरी और कई उपहार लेकर हेमा के घर पहुंचे। सिर्फ इसलिए कि जया चक्रवर्ती का दिल जीत सकें। हालांकि पूरी तरह उनका मन बदलना आसान नहीं था, लेकिन धर्मेंद्र का यह प्रयास उनके सच्चे इरादों का संकेत था। फिर आया वो फैसला जिसने पूरे देश को चौंका दिया। धर्मेंद्र और हेमा दोनों ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया ताकि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत दूसरी शादी कर सकें। धर्मेंद्र बने दिलावर खान और हेमा बनी आयशा भी 1979 में उन्होंने निकाह किया और कुछ सालों तक इस शादी को गुप्त रखा।
अक्सर कहा जाता है कि धर्मेंद्र ने मुस्लिम धर्म अपनाया ताकि वे हेमा मालिनी से दूसरी शादी कर सकें। लेकिन हेमा ने बाद में एक इंटरव्यू में इस बात की अलग वजह बताई। उनके अनुसार धर्म बदलना उनके लिए सिर्फ एक कानूनी औपचारिकता थी ताकि रिश्ते को लेकर किसी तरह की रुकावट या विवाद ना हो। उन्होंने कहा था कि उनके लिए सबसे बड़ा धर्म प्यार था और इस कदम का उद्देश्य सिर्फ अपने रिश्ते को समाज के दबाव और कानून की जटिलताओं से बचाना था। दूसरी शादी के बाद धर्मेंद्र की ज़िंदगी दो हिस्सों में बंट चुकी थी। एक तरफ मुंबई के जहू में हेमा मालिनी और उनकी दो बेटियां ईशा और अहाना। दूसरी तरफ पंजाब से जुड़े जड़ों वाले घर में पहली पत्नी प्रकाश कौर और बेटे सनी व बॉबी। ये दो दुनिया बिल्कुल अलग थी। एक में फिल्मी पार्टियों की चमक-दमक दूसरी में घर के आंगन की सादगी। धर्मेंद्र इन दोनों घरों के बीच एक पतली डोर पर चल रहे थे।
सुबह कभी सेट पर हेमा के साथ रोमांटिक सीन, शाम को सनी की स्कूल मीटिंग या बॉबी का बर्थडे। उन्होंने कोशिश की कि किसी को भी यह महसूस ना हो कि वह दूसरे से ज्यादा महत्वपूर्ण है। सनी और बॉबी के करियर की शुरुआत में उन्होंने पूरा साथ दिया। सनी को बेताब और बॉबी को बरसात के जरिए लॉन्च करना यह सिर्फ एक पिता नहीं बल्कि एक प्रोड्यूसर और मेंटर की जिम्मेदारी थी। उधर हेमा मालिनी भी इस रिश्ते में अपनी शर्तों के साथ थी। उन्होंने धर्मेंद्र से साफ कर दिया था कि बेटियों की परवरिश उनकी पहली प्राथमिकता होगी। वो चाहती थी कि बेटियां मां-बाप दोनों का प्यार महसूस करें। भले ही परिस्थितियां अलग हो और सच तो ये है कि शुरुआती वर्षों में धर्मेंद्र ने यह संतुलन बखूबी निभाया। लेकिन यह आसान नहीं था। मीडिया अक्सर इन रिश्तों पर सवाल खड़ा करता कौन सा घर असली है? किसके साथ ज्यादा वक्त बिताते हैं? धर्मेंद्र ने हमेशा चुप्पी साधी और दोनों परिवारों को कैमरे से बचाने की कोशिश की। दिलचस्प बात यह है कि दोनों घरों के बच्चे एक दूसरे के प्रति कभी कटुता में नहीं दिखे। ईशा और अहाना ने पब्लिक में कई बार कहा कि उन्हें अपने भाइयों सनी और बॉबी पर गर्व है। और सनी ने भी एक इंटरव्यू में कहा था हमारे पिता का दिल इतना बड़ा है कि वह दो परिवार संभाल सकते हैं।
लेकिन वक्त का खेल यहीं नहीं रुकता। करियर के ऊंचे शिखर पर होते हुए भी उम्र की रफ्तार धीमे-धीमे रिश्तों की चमक पर असर डालने लगी थी। आने वाले सालों में यह संतुलन दरकने वाला था और इसके दरकने की सबसे बड़ी आहट तब आई जब धर्मेंद्र ने बीमारियों से लड़ना शुरू किया। कभी घोड़े पर सवार होकर पर्दे पर खलनायकों को धूल चटाने वाले धर्मेंद्र अब 90 की उम्र के करीब अपने शरीर की नाजुकियत से जूझ रहे हैं। 2025 की शुरुआत में उनकी आंख से जुड़ी एक गंभीर समस्या ने उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया। डॉक्टर्स ने उनकी आंख का ग्राफ्ट कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया। एक नाजुक सर्जरी जो उम्र के साथ बढ़ते रिस्क के कारण आसान नहीं थी। अस्पताल से निकलते वक्त बाई आंख पर सफेद पट्टी बंधी थी। कैमरो ने घेरा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा अभी भी बहुत दम है। मेरी आंख में ग्राफ्ट हो गया है। यह उनकी ज़िद थी जो हमेशा उन्हें गिरने के बाद भी खड़ा कर देती है। लेकिन इस सर्जरी की तस्वीरों में एक और कहानी छुपी थी। उनके पास कौन था और कौन नहीं। जब-जब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। मीडिया ने देखा कि उनके साथ पहली पत्नी प्रकाश कौर और बेटे सनी बॉबी मौजूद थे। वहीं हेमा मालिनी बस औपचारिक तौर पर मिलने आई और तुरंत लौट गई।
इलाज के लिए अमेरिका ले जाने का फैसला हुआ तो फ्लाइट में सात थे बेटे और पहला परिवार। ड्रीम गर्ल नजर नहीं आई। सनी देओल ने एक इंटरव्यू में साफ कहा मां प्रकाश कौर हमेशा पापा के लिए रही हैं। फिर चाहे हालात कैसे भी हो यह बयान सिर्फ एक लाइन नहीं था बल्कि उस रिश्ते का प्रमाण था जो बिना प्रचार और बिना तमाशे के हमेशा खड़ा रहा। प्रकाश कौर जिन्होंने कभी मीडिया में अपने दर्द का इजहार नहीं किया। अब दिन रात धर्मेंद्र के पास थी दवाइयां देना। आंख का ड्रॉप टाइम पर लगाना, उनके हाथ पकड़ कर पुराने दिनों की कहानियां सुनाना यह सिर्फ देखभाल नहीं बल्कि एक पुराने अधूरे रिश्ते में फिर से जान डालना था। इस दौरान सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनल्स पर सवाल उठने लगे। क्या धर्मेंद्र और हेमा के बीच की नजदीकियां अब बस बीते जमाने की बातें रह गई हैं। क्या यह वही कहानी है जहां जवानी का प्यार बुढ़ापे में सच्चे सहारे से हार जाता है? धर्मेंद्र की आंख की सर्जरी सिर्फ एक मेडिकल इवेंट नहीं थी। यह उनकी जिंदगी का आईना थी। उन्होंने अपनी मोहब्बत के लिए दुनिया से बगावत की थी।
धर्म बदला था लेकिन बुढ़ापे में साथ वही था जिसे कभी अतीत मानकर पीछे छोड़ दिया था। शायद उम्र यही सिखाती है कि असली घर वो है जहां आपको बिना शर्त अपनाया जाए। शोहरत और रिश्तों की चमक फीकी पड़ जाती है। लेकिन वह हाथ जो मुश्किल वक्त में आपके माथे पर ठंडा स्पर्श रखे वही आपकी आखिरी पनाह बन जाता है। और आज धर्मेंद्र के लिए वह हाथ प्रकाश कौर का है। यह सिर्फ एक पति-पत्नी की कहानी नहीं बल्कि उस सच्चाई का आईना है जिससे हम सब एक दिन रूबरू होते हैं कि वक्त मोहब्बत और शोहरत से भी ताकतवर है। यह तय करता है कि अंत में आपके पास कौन खड़ा रहेगा और अक्सर वो कोई ऐसा होता है जिसे आपने कभी हल्के में लिया था। अगर आपको धर्मेंद्र की ये सच्ची फिल्मी सी लगने वाली कहानी दिल को छू गई हो तो वीडियो को लाइक कीजिए। दोस्तों के साथ शेयर कीजिए और चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए क्योंकि अगली कहानी भी आपको इसी तरह सिनेमा और हकीकत के मिलन पर ले जाएगी।
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